आने वाले हैं कर्ज लेने वालों के अच्छे दिन!


आने वाले हैं कर्ज लेने वालों के अच्छे दिन! 


आरबीआई के हालिया कदमों का असर दिखने पर होम लोन लेने वालों को ब्याज दर के मामले में एक पारदर्शी व्यवस्था मिल सकती है। आरबीआई ने पिछले महीने बेस रेट तय करने का तरीका बदलने का ऐलान किया था। इसे जल्द लागू किया जाएगा। बेस रेट वह न्यूनतम दर है, जिस पर बैंक कर्ज दे सकते हैं। इस ऐलान से पहले आरबीआई ने जनवरी में रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट्स घटाकर और फरवरी में स्टैट्यूटरी लिक्विडिटी रेशो को 50 बेसिस पॉइंट्स कमकर बैंकों को ब्याज दरें घटाने की राह दिखाई थी।

एसएलआर नेट डिपॉजिट का वह हिस्सा होता है, जिसे बैंकों को सरकारी बॉन्ड्स में अनिवार्य रूप से लगाना होता है। आरबीआई का संदेश साफ है कि इंटरेस्ट रेट साइकल में बदलाव शुरू हो गया है। लोन कंसल्टेंसी फर्म मॉर्गेजवर्ल्ड के फाउंडर विपुल पटेल ने कहा, 'एसएलआर कट ने सिस्टम में 45,000 करोड़ रुपये बढ़ाए। इससे कर्ज देने के मामले में बैंकों में होड़ मचनी चाहिए। ऐसा हुआ तो रेट कट का फायदा कर्ज लेने वालों तक पहुंचेगा।'

आरबीआई ने जनवरी में जब रीपो रेट 25 बेसिस पॉइंट्स घटाया था तो ज्यादातर बैंकों ने इसका फायदा बॉरोअर्स को नहीं दिया। ऐसा पहले भी हो चुका है। आरबीआई ने कई बार इस पर चिंता भी जताई है। आरबीआई ने बैंकों से यह भी कहा है कि वे बेस रेट तय करने का फॉर्मूला बदलें। बैंकों को 19 फरवरी तक नया फॉर्म्युला अपना लेना है।

अब तक बैंक बेस रेट तय करने के लिए अपनी पसंद से किसी भी अवधि वाले डिपॉजिट पर ब्याज दर को या डिपॉजिट्स की औसत लागत को आधार बना लेते थे। बेस रेट तय करने के लिए कई बैंक ऐसी बकेट चुनते थे, जिसका डिपॉजिट बेस कम हो। ऐसी बकेट की ब्याज दर दरअसल उनके पूरे फंड की लागत का आईना नहीं होती थी। नया तरीका लागू होने पर बैंकों को या तो उस डिपॉजिट बकेट की लागत को आधार बनाना होगा, जिसका उनके डिपॉजिट बेस में सबसे ज्यादा हिस्सा होगा या उन्हें फंड की एवरेज कॉस्ट को आधार बनाना होगा।

इसके पीछे सोच यह है कि डिपॉजिट बेस में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी वाले डिपॉजिट की लागत बैंक की कुल फंड कॉस्ट की ज्यादा सही तस्वीर दिखाएगी। इस बकेट में कोई भी घट-बढ़ का असर बॉरोअर्स तक आना चाहिए।

रिटेललेंडिंगडॉटकॉम की फाउंडर सुकन्या कुमार ने कहा, 'अब तक इस फॉर्म्युला की समीक्षा हर पांच साल पर होती थी। अब तीन साल पर होगी। यह अच्छी बात है।' बेस रेट की मौजूदा प्रणाली को भी प्राइम लेंडिंग रेट सिस्टम की जगह पर लाया गया था। इसका मकसद आरबीआई की ओर से रेट कट का फायदा बॉरोअर्स तक पहुंचाना था।

फिर भी भेदभाव चलता रहा। बेस रेट में भले ही बदलाव न किया जाता हो, लेकिन नए बॉरोअर्स को बेस रेट पर मामूली प्रीमियम से लुभाया जाता था। अब आरबीआई ने निर्देश दिया है कि अगर बॉरोअर्स की किसी कैटिगरी को कोई स्प्रेड दिया जाए तो बैंकों की इंटरनल प्राइसिंग पॉलिसी में साफ तौर पर इसकी वजह बतानी होगी। अभय क्रेडिट काउंसलिंग सेंटर के चीफ क्रेडिट काउंसलर वी एन कुलकर्णी ने कहा, 'बैंक मनमाने तरीके से बेस रेट के ऊपर स्प्रेड तय नहीं कर सकेंगे और इस तरह एक ही कैटिगरी के बॉरोअर्स (उदाहरण के लिए होम लोन) के मौजूदा और नए कर्जदारों में भेदभाव नहीं कर सकेंगे।'

होम लोन लेने वालों की बैंकों से दो मुख्य शिकायतें रही हैं। पहली तो यह कि जब आरबीआई पॉलिसी रेट्स बढ़ाता है तो बैंक तुरंत कदम उठा लेते हैं, लेकिन जब रेट कट होता है तो वे चुपचाप बैठे रहते हैं। दूसरी शिकायत यह है कि नए बॉरोअर्स को कम रेट ऑफर कर बैंक मौजूदा कर्जदारों से भेदभाव करते हैं। आरबीआई के नए बेस रेट फॉर्म्युला से ये शिकायतें दूर हो जानी चाहिए। हालांकि पटेल ने कहा, 'बैंक अब भी अपनी बेस रेट तय करने का तरीका चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। समय ही बताएगा कि आरबीआई के निर्देश का कैसा असर पड़ता है।'

SOURCE - NAVBHARAT TIMES 

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